भरे पन्नों और किताबों की जरूरत नहीं है,
बस एक शब्द बन जाये, जो कारवां हिला दे,
लाखों हजारों मशालों का क्या करूँ मैं,
एक चिंगारी बहुत है, जो सब को जला दे।
ये पहाड़ों की धरती आज कुछ कह रही है
खुद भी समझ ले और सब को सुना दे।
मेरे आँचल में खुशियाँ क्या कम हैं?
जो भटकता है तू दर-ब-दर,
खेत में उग जाएँ हीरे, और जंगल में मोती,
थोड़ी से जान ले गर तू कदर
ये पहाड़ों की धरती आज कुछ कह रही है
खुद भी समझ ले और सब को सुना दे।








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