Thursday, December 13, 2012

कहानी मेरी नयी जंग की



माना की ये जंग जो हमने छेड़ी है, पत्थर के उपर पेड़ उगाने की है,
लेकिन हमारे इरादों के तूफान, इसे थोड़ी मिट्टी जरूर देंगे।
रोपेंगे हम इसे, आपके समर्थन नुमा पानी से,
अगर फल ना भी मिल पायें तो क्या, चटकती धुप में छाँव तो लेंगे।

किसी ने हां कहा तो किसी ने ना कहा,
मेरी इस नयी जंग में हर किसी ने दिया बयां,
कोई कहता तू पहुँच जायेगा फलक तक,
तो किसी ने कहा मुन्ना, जमीन में सिमट जायेगा।

दिल और दिमाग में सुनामी सा कुछ आया है,
हाँ और ना दोनों ही टीमों ने मुझे सताया है,
ना की ना सुनो तो कहेंगे कल, "बेटा हमने पहले ही कहा था",
और गर हाँ की न सुनो तो कहेंगे "तू कहता बहुत है।"

कोई कहता साथ हैं हम तेरे, तो कोई अकेले मरने की देता दुआ,
अगर साथ मिल जाये इस नयी जंग में किसी का,
तो हम खुश किस्मत हैं,



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