मैं उस भीड़ भरी तन्हाई पे क्या लिखूं,
मैं इस ज़माने की बेवफाई पे क्या लिखूं|
मेरे गिरते होंसलों को तुने आसमां कर दिया,
ये दोस्त मैं तेरी वफाई पे क्या लिखूं|
कोई मेरे बुझे दिए जला दे,
ये फितरत नहीं थी, इस ज़माने की,
मेरी अँधेरे रास्तों में, तुने जो खुद जल के उजाले किये,
तेरे उस रोशन नज़ारे पे क्या लिखूं|
मैं लिखता बड़ा हूँ यार,
पर रूक गयी, अब ये कलम,
मैं सोचता हूँ, हर पल ये मेरे खुदा,
तेरी प्यारी-सी मूरत पे लिखूं|
Monday, August 8, 2011
मैं क्या लिखूं
4:10 AM
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