खुद की चिता जला दी है अब कुछ अरमानो के साथ में।
आखरी मंजिल मिलने तक ग़ालिब अब मैं नहीं मारूंगा||

"कोशिशों की जंग में अगर मैं खो दूं, ये नश्वर शरीर,
तो काली रात के अंधेरों में ही जलाना, मेरी चिता को,
मैं आखरी दम तक अंधेरों में दिए जलाना चाहता हूँ"

||दो अल्फाज कह देता हूँ तुजसे कि अब मैं कुछ कहूँगा नहीं।|
॥गर किा हो इश्क दिल से कभी तो, ख़ामोशी पढ़ लेना मेरी॥

एक दृश्य, टेहरी बाँध के नजदीक

यह बाँध गंगा नदी की प्रमुख सहयोगी नदी भागीरथी पर बनाया गया है। टिहरी बाँध की ऊँचाई २६१ मीटर है जो इसे विश्व का पाँचवा सबसे ऊँचा बाँध बनाती है।

Friday, October 21, 2011

हम रुकना नहीं चाहते


















हम रुकना नहीं चाहते, तन्हा इन राहों में,
क्या करें कमबख्त आगे रास्ता ही नहीं है,
इन हाथों में मशालें तो बड़ी-बड़ी हैं,
बस कोई जला के इन्हे रोशन करता ही नहीं है|

ये मंज़िल धुंधली सी क्यों पड़ गयी है,
मेरी सपनो की कहानी अधूरी से क्यों हुई है,
रात के अँधेरे में हमने तो लिया था जुगनू का सहारा
फिर ये सुबह की किरण बुझ क्यों रही है|

सपनो में भाग पड़ते है बड़ी तेजी से,
फिर दिन में ये राहें, थम क्यों गयी हैं,
हम तो साथ लेके सब को चले थे,
अब हर निगाह बदल क्यों गयी है|

कह दे, जहाँ से में तन्हा नहीं हूँ,
रुसवा हूँ, लेकिन बदला नहीं हूँ,
गर चल जाये थोड़ी से ये हवा तो,
मैं उड़ जाऊं गगन में,
परेशां हूँ थोडा, हारा नहीं हूँ|

बदल के जमाना हम भी बदल जायेंगे,
मंजिल पे अपनी हम चढ़ जायेंगे,
जरा साथ दे दे, तू ए मेरे दोस्त,
दुनिया को हम भी दिखा जायेंगे|

Wednesday, August 10, 2011

जिंदगी मैं तुझे

जिंदगी मैं तुझे जी कहाँ रहा हूँ,
तू तो बस कटे जा रही है|

कभी रात की तनहाइयों के उजालों में,
तो कभी दिन की सूनी तनहाइयों में,

हर महफ़िल का सूना कोना,
और हर याद का जर्रा कहता है,

मैं मजबूर हूँ और तू सिर्फ,
मुझ से दूर चले जा रही है|

मेरी हर बेदर्द, कमजोर अदा पे,
गैरों की तरह हँसे जा रही है|

जिंदगी मैं तुझे जी कहाँ रहा हूँ,
तू तो बस कटे जा रही है|


मेरे दिल की तम्मना


तेरे मेरे बीच जो दूरियां हैं,
वो मीलों में नहीं, दिलों में हैं।
प्यार के काफिले फिर दिल से चला के तो देख,
दूरियां मिट जाएगी, बिना पैर बढ़ाये|

तेरे चाँद से चहेरे को,
देखने की खता इन आँखों ने की थी|
फिर इतना दर्द मेरे दिल को क्यों दिया,
बेक़सूर ये मेरे दिल की तम्मना थी|

एक बार तो सीने से लगा दे मेरे साथी,
एक बार तो मेरे पास मुस्कराले मेरे साथी|
मैं भी सोचूंगा की तू हर वक्त मेरे साथ था,
एक बार तो मेरे जनाजे पे आजा मेरे साथी|

गर बेक़सूर है तू , बेक़सूर हूँ मैं,
तो गम-ए-जुदाई का इल्जाम किसे दें,
मान लेते हैं ये गुनाह तो अपना ही है,
बस प्यार के लिए इतना कर दें|